विश्व हिंदी परिषद के राष्ट्रीय महासचिव एवं वित्त मंत्रालय, भारत सरकार की हिंदी सलाहकार समिति के सदस्य डॉ. विपिन कुमार जी का संदेश
“हिन्दी का सम्मान — देश का स्वाभिमान”
हिन्दी केवल हमारी बोली नहीं, यह हमारी पहचान है… हमारे इतिहास की गूंज है… हमारे संस्कारों की सुगंध है। जब हम हिन्दी बोलते हैं, तो केवल शब्द नहीं निकलते—हमारी आत्मा, हमारी संस्कृति और हमारे राष्ट्र का गौरव अभिव्यक्त होता है।
हिन्दी का सम्मान करना, दरअसल अपने देश के स्वाभिमान को सम्मान देना है। यह वह सूत्र है जो हमें एकता में बाँधता है, जो विविधता में समरसता का संदेश देता है और जो भारत को विश्व पटल पर एक विशिष्ट पहचान प्रदान करता है।
विश्व हिन्दी परिषद इसी भावना को लेकर निरंतर कार्यरत है—हिन्दी को जन-जन की सहज भाषा बनाते हुए उसे वैश्विक मंच तक पहुँचाने के लिए। हमारा प्रयास है कि हिन्दी केवल संवाद का माध्यम न रहे, बल्कि विश्व को जोड़ने वाली संवेदना बने, एक ऐसी शक्ति बने जो सीमाओं से परे दिलों को जोड़ सके।
आज समय की पुकार है कि हम हिन्दी को केवल एक विकल्प नहीं, बल्कि अपना स्वाभाविक गर्व बनाएं। अपने दैनिक जीवन, अपने कार्य, अपने विचार—हर स्तर पर हिन्दी को स्थान दें। यही छोटे-छोटे कदम मिलकर एक बड़े परिवर्तन का आधार बनते हैं।
मैं आप सभी से हृदय से आग्रह करता हूँ— आइए, हम हिन्दी को केवल अपनाएँ नहीं, बल्कि उसे जीएँ… उसके सम्मान को अपना संकल्प बनाएं… और देश के स्वाभिमान को नई ऊँचाइयों तक पहुँचाएं।
आइए, मिलकर यह प्रण लें— हिन्दी का सम्मान ही देश का स्वाभिमान है।
आपका साथ, हिन्दी को विश्व तक पहुँचाने की सबसे बड़ी शक्ति है।