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19 मार्च, 2026 को भारतीय हिंदी नववर्ष के अवसर पर पीजीडीएवी कॉलेज में विश्व हिंदी परिषद द्वारा आयोजित “भारत को जानें” कार्यक्रम

विश्व हिंदी परिषद ने मनाया भारतीय हिंदी नववर्ष: आरएसएस के वरिष्ठ प्रचारक श्री रवि अय्यर का प्रेरक संबोधन

आज के वैश्विक परिदृश्य में, जहाँ आधुनिकता और पाश्चात्य प्रभाव तेजी से समाज के हर वर्ग को प्रभावित कर रहे हैं, वहीं अपनी भाषा और संस्कृति को संरक्षित रखना एक बड़ी चुनौती बनती जा रही है। ऐसे समय में भारतीय हिंदी नववर्ष विक्रमी संवत् 2083 के सुअवसर पर आयोजित कार्यक्रम केवल औपचारिक आयोजन नहीं, बल्कि सांस्कृतिक पुनर्जागरण के सशक्त माध्यम के रूप में उभर रहे हैं।
नई दिल्ली के पीजीडीएवी कॉलेज में विश्व हिंदी परिषद द्वारा 19 मार्च 2026 को आयोजित “भारत को जानें” कार्यक्रम इसी दिशा में एक महत्वपूर्ण पहल के रूप में देखा जाना चाहिए। विशेष रूप से युवा पीढ़ी को ध्यान में रखकर किए गए इस कार्यक्रम का आयोजन यह दर्शाता है कि समाज अब अपनी जड़ों की ओर लौटने की आवश्यकता को समझने लगा है।
कार्यक्रम में मुख्य अतिथि के रूप में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के वरिष्ठ प्रचारक श्री रवि अय्यर जी की गरिमामयी उपस्थिति रही। कार्यक्रम की अध्यक्षता पीजीडीएवी कॉलेज के प्राचार्य डॉ. रवीन्द्र कुमार गुप्ता जी ने की। इसके साथ ही मुख्य समन्वयक के रूप में शिक्षा मंत्रालय, भारत सरकार के सदस्य श्री देवी प्रसाद मिश्र जी की उपस्थिति ने कार्यक्रम को और अधिक गरिमा प्रदान की। वहीं, इस कार्यक्रम का कुशल नेतृत्व विश्व हिंदी परिषद के राष्ट्रीय महासचिव डॉ. विपिन कुमार जी के मार्गदर्शन में सम्पन्न हुआ।साथ ही, ईस्ट ऑफ कैलाश इस्कॉन के पांडव प्रेम प्रभु जी की गरिमामयी उपस्थिति ने कार्यक्रम को आध्यात्मिक ऊर्जा से भी अभिसिंचित किया।सभी अतिथियों की उपस्थिति ने कार्यक्रम को एक गंभीर, प्रभावशाली एवं प्रेरणादायी स्वरूप प्रदान किया।
यह कार्यक्रम इस बात का सशक्त उदाहरण है कि हिंदी केवल संवाद का साधन नहीं, बल्कि भारतीय संस्कृति, परंपरा और राष्ट्रीय एकता की आधारशिला है।
आज यह एक स्थापित सत्य है कि युवा पीढ़ी का एक बड़ा वर्ग अपनी भाषा और सांस्कृतिक विरासत से धीरे-धीरे दूर होता जा रहा है। शिक्षा, रोजगार और सामाजिक प्रतिष्ठा के संदर्भ में अंग्रेज़ी का बढ़ता प्रभाव कहीं न कहीं हिंदी और अन्य भारतीय भाषाओं के महत्व को चुनौती दे रहा है। ऐसे में “भारत को जानें” जैसे कार्यक्रम युवाओं को अपनी पहचान से जोड़ने का एक प्रभावी माध्यम बन सकते हैं।
इस प्रकार के आयोजनों में विभिन्न क्षेत्रों के विद्वानों और गणमान्य व्यक्तियों की उपस्थिति यह संकेत देती है कि हिंदी के प्रति समाज में अभी भी व्यापक संवेदनशीलता और प्रतिबद्धता मौजूद है। जब अनुभवी विचारक और शिक्षाविद हिंदी के महत्व पर प्रकाश डालते हैं, तो उसका प्रभाव केवल मंच तक सीमित नहीं रहता, बल्कि समाज के व्यापक वर्ग तक पहुँचता है। इससे यह संदेश जाता है कि हिंदी केवल अतीत की विरासत नहीं, बल्कि वर्तमान और भविष्य की आवश्यकता भी है।
विशेष रूप से यह ध्यान देने योग्य है कि ऐसे कार्यक्रमों में युवाओं की सक्रिय भागीदारी देखने को मिल रही है। यह इस बात का प्रमाण है कि यदि उन्हें सही दिशा, मंच और अवसर दिया जाए, तो वे अपनी भाषा और संस्कृति के संरक्षण में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं। यह पहल न केवल उनके ज्ञान को समृद्ध करती है, बल्कि उनमें आत्मगौरव और सांस्कृतिक चेतना का विकास भी करती है।
हिंदी के संदर्भ में यह समझना अत्यंत आवश्यक है कि भाषा केवल संप्रेषण का माध्यम नहीं होती, बल्कि यह हमारी सोच, संस्कार और पहचान की आधारशिला होती है। जब हम अपनी भाषा से जुड़ते हैं, तो हम अपनी परंपराओं, मूल्यों और इतिहास से भी जुड़े रहते हैं। इसलिए हिंदी का संरक्षण और संवर्धन केवल भाषाई प्रयास नहीं, बल्कि एक व्यापक सांस्कृतिक दायित्व है।
सरकार, शैक्षणिक संस्थानों और सामाजिक संगठनों को मिलकर इस दिशा में निरंतर प्रयास करने की आवश्यकता है। शिक्षा प्रणाली में भारतीय भाषाओं को प्राथमिकता देना, सांस्कृतिक कार्यक्रमों को प्रोत्साहित करना और युवाओं को इनसे जोड़ना समय की मांग है। “भारत को जानें” जैसे कार्यक्रम इस दिशा में एक मजबूत आधार प्रदान करते हैं, जिन्हें और अधिक व्यापक स्तर पर आयोजित किया जाना चाहिए।
हिंदी नववर्ष जैसे अवसर इन प्रयासों को और अधिक सार्थक बना देते हैं। यह केवल एक तिथि का उत्सव नहीं, बल्कि भाषा और संस्कृति के प्रति हमारी प्रतिबद्धता को पुनः जागृत करने का अवसर है। यदि ऐसे आयोजनों को निरंतरता और व्यापकता दी जाए, तो यह न केवल हिंदी के प्रचार-प्रसार में सहायक होंगे, बल्कि देश की सांस्कृतिक एकता को भी सुदृढ़ करेंगे।
अंततः यह कहा जा सकता है कि हिंदी का भविष्य केवल नीतियों और योजनाओं पर निर्भर नहीं है, बल्कि समाज की सक्रिय भागीदारी पर आधारित है। यदि युवा पीढ़ी हिंदी को अपनाती है और उसे अपने जीवन का हिस्सा बनाती है, तो यह भाषा न केवल राष्ट्रीय स्तर पर, बल्कि वैश्विक स्तर पर भी अपनी सशक्त पहचान बनाए रखेगी।
हिंदी नववर्ष के अवसर पर आयोजित “भारत को जानें” कार्यक्रम इसी दिशा में एक सकारात्मक संकेत है—एक ऐसा प्रयास, जिसके माध्यम से देश की युवा पीढ़ी को जागरूक किया गया, और जो यह दर्शाता है कि भारत अपनी सांस्कृतिक जड़ों को संजोते हुए आधुनिकता की ओर आत्मविश्वास के साथ बढ़ सकता है।