Skip to main content

Vishwa Hindi Parishad | विश्व हिंदी परिषद

+(011) 35990037 , +(91) 8586016348

समान नागरिक संहिता: गृह मंत्री अमित शाह की विविधता में एकता की ख़ास पहल – 13.04.2026 (दैनिक भास्कर)

भारत जैसे बहुलतावादी समाज में, जहाँ धर्म, भाषा, संस्कृति और परंपराओं की अपार विविधता मौजूद है, वहाँ “एक राष्ट्र, एक कानून” की अवधारणा लंबे समय से बहस का विषय रही है। इसी संदर्भ में गृह मंत्री अमित शाह द्वारा बार-बार उठाया गया समान नागरिक संहिता का मुद्दा न केवल राजनीतिक विमर्श का केंद्र बना है, बल्कि सामाजिक और संवैधानिक बहस को भी नई दिशा दे रहा है।

समान नागरिक संहिता का मूल उद्देश्य यह है कि देश के सभी नागरिकों के लिए विवाह, तलाक, उत्तराधिकार और गोद लेने जैसे व्यक्तिगत कानून एक समान हों, चाहे उनका धर्म कोई भी हो। वर्तमान में भारत में अलग-अलग धर्मों के लिए अलग-अलग व्यक्तिगत कानून लागू हैं, जो ऐतिहासिक और सांस्कृतिक आधार पर विकसित हुए हैं। ऐसे में समान नागरिक संहिता का प्रस्ताव इन विविध कानूनों को एक समान ढाँचे में लाने की बात करता है।

इस विचार के समर्थकों का मानना है कि यह कदम संविधान के उस मूल सिद्धांत को सुदृढ़ करेगा, जिसमें सभी नागरिकों के लिए समानता की बात कही गई है। उनका तर्क है कि जब देश के आपराधिक और दीवानी कानून एक समान हैं, तो व्यक्तिगत कानूनों में भिन्नता क्यों होनी चाहिए? विशेष रूप से महिलाओं के अधिकारों के संदर्भ में, समान नागरिक संहिता को एक प्रगतिशील कदम माना जा रहा है, जो लैंगिक समानता को सुनिश्चित कर सकता है।

गृह मंत्री अमित शाह ने कई मंचों से यह स्पष्ट किया है कि समान नागरिक संहिता केवल एक कानूनी सुधार नहीं, बल्कि सामाजिक न्याय की दिशा में एक महत्वपूर्ण पहल है। उनके अनुसार, यह कानून समाज में समानता और न्याय की भावना को मजबूत करेगा तथा देश की एकता को और सुदृढ़ बनाएगा। यह दृष्टिकोण समान नागरिक संहिता को केवल एक राजनीतिक एजेंडा नहीं, बल्कि राष्ट्र निर्माण की प्रक्रिया का हिस्सा बताता है।

हालाँकि, इस पहल के विरोध में भी कई तर्क सामने आते हैं। आलोचकों का कहना है कि भारत की विविधता उसकी ताकत है, और अलग-अलग समुदायों के व्यक्तिगत कानून उनकी सांस्कृतिक पहचान का हिस्सा हैं। ऐसे में समान नागरिक संहिता लागू करने से इन परंपराओं और मान्यताओं पर प्रभाव पड़ सकता है। यह आशंका भी जताई जाती है कि यदि इसे संवेदनशीलता और संवाद के बिना लागू किया गया, तो सामाजिक तनाव उत्पन्न हो सकता है।

यही वह बिंदु है जहाँ संतुलन की आवश्यकता सबसे अधिक है। समान नागरिक संहिता का उद्देश्य यदि वास्तव में समानता और न्याय सुनिश्चित करना है, तो इसे लागू करने की प्रक्रिया भी उतनी ही समावेशी और विचारशील होनी चाहिए। विभिन्न समुदायों, धार्मिक नेताओं और विधि विशेषज्ञों के साथ व्यापक संवाद इस दिशा में आवश्यक कदम होगा।

इसके साथ ही, यह भी समझना होगा कि “समानता” का अर्थ केवल एकरूपता नहीं होता। भारत की सांस्कृतिक विविधता को बनाए रखते हुए समान अधिकारों की स्थापना करना ही वास्तविक चुनौती है। यदि समान नागरिक संहिता इस संतुलन को साधने में सफल होता है, तो यह न केवल कानूनी सुधार होगा, बल्कि सामाजिक परिवर्तन का एक ऐतिहासिक कदम भी साबित हो सकता है।

अंततः, समान नागरिक संहिता का प्रश्न केवल कानून का नहीं, बल्कि समाज के स्वरूप का भी है। यह तय करेगा कि भारत अपनी विविधता को किस प्रकार संजोते हुए समानता की दिशा में आगे बढ़ता है। गृह मंत्री अमित शाह द्वारा उठाया गया यह मुद्दा आने वाले समय में देश के सामाजिक और राजनीतिक परिदृश्य को गहराई से प्रभावित कर सकता है।

इसलिए, समान नागरिक संहिता पर बहस केवल समर्थन या विरोध तक सीमित नहीं रहनी चाहिए, बल्कि इसे एक व्यापक राष्ट्रीय संवाद के रूप में देखा जाना चाहिए—जहाँ हर आवाज़ को सुना जाए और हर दृष्टिकोण को समझा जाए। तभी यह पहल वास्तव में “विविधता में एकता” के भारतीय आदर्श को साकार कर सकेगी।

📣 हमसे जुड़ें हमारा WhatsApp Channel Join करें! ▶ Join Now
WhatsApp