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मोदी और पुतिन : बदलते विश्व में नई रणनीतिक साझेदारी – 08.12.2025 (वीर अर्जुन)

बीसवीं शताब्दी के उत्तरार्ध से लेकर इक्कीसवीं सदी के तीसरे दशक तक, भारत और रूस के संबंध वैश्विक राजनीति के बदलते स्वरूप के बीच एक स्थिर और विश्वसनीय धुरी की तरह खड़े रहे हैं। कभी शीत युद्ध के संघर्षपूर्ण वातावरण में, तो कभी तेजी से उभरते बहुध्रुवीय विश्व में—दोनों देशों ने एक–दूसरे को न केवल रणनीतिक साझेदार की तरह बल्कि दीर्घकालिक मित्र के रूप में भी देखा। रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन की हाल की भारत यात्रा तथा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ उनकी विस्तृत और महत्त्वपूर्ण वार्ताओं ने इस ऐतिहासिक संबंध को एक नई ऊर्जा प्रदान की है। यह केवल कूटनीतिक शिष्टाचार या पारंपरिक मित्रता का दोहराव नहीं था, बल्कि वैश्विक शक्ति–संतुलन के नए अध्याय में भारत–रूस सहयोग की प्रासंगिकता का गंभीर और बहुआयामी संकेत भी था।

पुतिन की यह यात्रा ऐसे समय हुई, जब विश्व शक्ति–संरचना गहन बदलावों से गुजर रही है। यूरोप–रूस संबंधों में तनाव, एशिया में उभरते सामरिक समीकरण, ऊर्जा बाज़ारों में अनिश्चितता, तथा तकनीकी प्रतिस्पर्धा ने नई विश्व–व्यवस्था की रचना शुरू कर दी है। इस वातावरण में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और राष्ट्रपति पुतिन के बीच हुई मुलाकात ने यह प्रदर्शित किया कि भारत और रूस अपने संबंधों को केवल अतीत की विरासत के रूप में नहीं देखते, बल्कि भविष्य की संभावनाओं और चुनौतियों के अनुरूप उसे नए रूप में परिभाषित करने को तैयार हैं। राष्ट्रपति पुतिन और प्रधानमंत्री मोदी के बीच वार्ताओं का सबसे प्रमुख बिंदु रहा—रणनीतिक स्वायत्तता और बहुध्रुवीय विश्व व्यवस्था की साझा अवधारणा। भारत अपनी स्वतंत्र विदेश नीति को लेकर स्पष्ट है; वह किसी एक धुरी का हिस्सा बनने के बजाय सबके साथ संतुलित संबंध बनाए रखना चाहता है। रूस इस सिद्धांत को लंबे समय से समझता और स्वीकार करता आया है। यही कारण है कि भारत–रूस संबंध कभी भी वैश्विक दबावों या अंतरराष्ट्रीय समीकरणों के शिकार नहीं बने। पुतिन और मोदी की बातचीत ने इसी परिप्रेक्ष्य को और अधिक मजबूत किया।

यात्रा के दौरान रक्षा सहयोग वार्ता का विशेष केंद्र रहा। भारत की रक्षा संरचना में रूस का योगदान दशकों से अत्यंत महत्त्वपूर्ण रहा है। आज भी S-400 एयर डिफ़ेंस सिस्टम, ब्रह्मोस सुपरसोनिक मिसाइल, अमेठी में AK-203 राइफल निर्माण और विभिन्न नौसैनिक एवं वायुसेना परियोजनाएँ इस साझेदारी की शक्ति को रेखांकित करती हैं। मोदी और पुतिन की बैठक में इन परियोजनाओं की प्रगति, भविष्य की आवश्यकताओं और उच्च–स्तरीय तकनीक के साझा विकास पर विस्तृत विमर्श हुआ। बदलते युद्ध–परिदृश्य, आर्टिफ़िशियल इंटेलिजेंस आधारित रक्षा प्रणालियों और साइबर सुरक्षा जैसे समकालीन विषयों पर भी नए सहयोग–क्षेत्र पहचाने गए। रक्षा के बाद ऊर्जा वह क्षेत्र है, जहाँ भारत और रूस के संबंध नई ऊँचाइयों को छू रहे हैं। वैश्विक ऊर्जा बाज़ार में अस्थिरता, कच्चे तेल की कीमतों में उतार–चढ़ाव और पश्चिमी प्रतिबंधों के बावजूद रूस भारत का प्रमुख ऊर्जा–सहयोगी बना हुआ है। कच्चे तेल के आयात में रिकॉर्ड वृद्धि तथा उर्वरक और गैस सहयोग में स्थिरता इसका प्रमाण है।

पुतिन–मोदी वार्ता में ऊर्जा क्षेत्र के स्थायी और दीर्घकालिक सहयोग पर ज़ोर दिया गया, जिसमें LNG सप्लाई, पाइपलाइन कनेक्टिविटी, और संयुक्त ऊर्जा–निवेश जैसे विषय शामिल थे। कूडनकुलम परमाणु ऊर्जा परियोजना, जो भारत में अपनी तरह की सबसे बड़ी परियोजना है, दोनों देशों की साझेदारी का महत्वपूर्ण स्तंभ है। इस यात्रा में इसके आगामी चरणों और नई परमाणु परियोजनाओं पर भी सकारात्मक संवाद हुआ। अंतरिक्ष और विज्ञान भी इस यात्रा के दौरान मुख्य बिंदुओं में शामिल रहे। भारत का महत्वाकांक्षी मानव अंतरिक्ष मिशन “गगनयान” रूसी विशेषज्ञता से पहले ही लाभान्वित हो रहा है। पुतिन और मोदी ने भविष्य में उपग्रह प्रक्षेपण, गहरे अंतरिक्ष अनुसंधान, आर्कटिक क्षेत्रों में वैज्ञानिक सहयोग और उच्च–प्रौद्योगिकी साझा विकास को नई दिशा देने पर सहमति जताई। यह वह क्षेत्र है, जहाँ भारत और रूस आने वाले दशक में वैश्विक स्तर पर नई भूमिका निभा सकते हैं। व्यापार और आर्थिक संबंधों के संदर्भ में यह यात्रा अत्यंत महत्त्वपूर्ण रही। दोनों देशों के बीच व्यापार 50 बिलियन डॉलर से आगे बढ़ चुका है और इसे भविष्य में 100 बिलियन डॉलर तक पहुँचाने का लक्ष्य रखा गया है।

इस दिशा में INSTC (इंटरनेशनल नॉर्थ–साउथ ट्रांसपोर्ट कॉरिडोर) और चाबहार पोर्ट के माध्यम से व्यापार मार्गों के विकास को सर्वोच्च प्राथमिकता दी गई। राष्ट्रीय मुद्राओं में व्यापार, बैंकिंग चैनलों का सरलीकरण, और निवेश परियोजनाओं को गति देने जैसे ठोस कदम भी प्रस्तावित किए गए। भारतीय फार्मा सेक्टर और रूसी ऊर्जा बाजार का परस्पर जुड़ाव आने वाले वर्षों में नई संभावनाएँ खोलेगा। वैश्विक राजनीति के संदर्भ में पुतिन–मोदी वार्ता विशेष रूप से उल्लेखनीय रही। यूक्रेन संघर्ष के समाधान के लिए भारत की स्पष्ट और संतुलित आवाज़—जो वार्ता और स्थायी शांति की वकालत करती है—को रूस ने सराहा। प्रधानमंत्री मोदी ने यह दोहराया कि युद्ध कभी समाधान नहीं होता; संवाद ही आगे का मार्ग है। पुतिन ने भी भारत की इस रचनात्मक भूमिका की प्रशंसा की। इससे भारत केवल एक तटस्थ देश नहीं बल्कि एक जिम्मेदार वैश्विक शक्ति के रूप में उभरा है, जिसके विचार और रुख विश्व–व्यवस्था के निर्माण में महत्त्वपूर्ण हैं।

संस्कृतिक संपर्क और मानवीय संबंध भी इस यात्रा के महत्वपूर्ण पहलू रहे। शिक्षा, कला, खेल, भारत–रूस युवा आदान–प्रदान कार्यक्रम, और दोनों देशों में आयोजित सांस्कृतिक उत्सव जन–स्तर पर मित्रता को नई मजबूती देने वाले तत्व हैं। रूस में भारतीय छात्रों की संख्या और भारत में रूसी भाषा व साहित्य के प्रति बढ़ती रुचि दो–तरफ़ा सांस्कृतिक विकास को दर्शाती है। पुतिन और मोदी की यह वार्ता केवल समझौतों का दस्तावेज़ नहीं बल्कि एक व्यापक दृष्टि–पत्र था, जिसमें दोनों देशों ने आने वाले दशक में अपनी भूमिका को स्पष्ट किया। यह स्पष्ट हो गया कि भारत–रूस संबंध किसी एक क्षेत्र तक सीमित नहीं, बल्कि रक्षा, ऊर्जा, विज्ञान, संस्कृति, शिक्षा, अंतरराष्ट्रीय कूटनीति और व्यापार—सभी क्षेत्रों में समान रूप से विस्तृत और मजबूत हैं। अंततः, पुतिन की भारत यात्रा ने यह संदेश दिया कि भारत–रूस साझेदारी अतीत की स्मृतियों या परंपरागत समीकरणों पर आधारित नहीं है। यह साझेदारी आज उन गहरी आवश्यकताओं और साझा दृष्टिकोण पर खड़ी है, जिनकी जरूरत बदलते विश्व–परिदृश्य को है। मोदी और पुतिन की यह मुलाकात न केवल दो नेताओं की बातचीत थी, बल्कि दो विश्व–सहभागियों की वह संयुक्त घोषणा भी थी, जो भविष्य की वैश्विक व्यवस्था में शांति, स्थिरता और विकास के नए मानदंड स्थापित करती है।

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