दिल्ली का विज्ञान भवन 21वीं सदी के उस वैचारिक संगम का साक्षी बना, जहाँ परंपरा और आधुनिकता, विचार और संवेदना, भाषा और दर्शन—सब एक ही सूत्र में बंधकर मानवता का विराट रूप प्रस्तुत कर रहे थे। पंडित दीनदयाल उपाध्याय की 110वीं जयंती पर विश्व हिंदी परिषद और भारतीय दार्शनिक अनुसंधान परिषद, नई दिल्ली के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित “राष्ट्रीयता और मानवता के प्रतीक : पंडित दीनदयाल उपाध्याय” विषयक दो-दिवसीय अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन केवल एक शैक्षणिक कार्यक्रम नहीं था, बल्कि भारत की सांस्कृतिक चेतना, हिंदी के वैश्विक उभार, और उपाध्याय जी के एकात्म मानववाद की अद्भुत पुनर्पुष्टि का उत्सव बनकर उभरा।
यह आयोजन उस भारत का दर्पण था जो अपने ज्ञान–मूल्यों, दार्शनिक परंपरा, भाषाई स्वाभिमान और सांस्कृतिक आत्मविश्वास के बल पर वैश्विक विमर्श में अग्रणी भूमिका निभाने की ओर अग्रसर है। विज्ञान भवन के सभागारों में गूँजती आवाजें केवल विद्वानों के भाषण नहीं थीं; वे उस भारतीय विचारधारा की प्रतिध्वनि थीं जिसकी जड़ें हजारों वर्ष गहरी हैं और जिसकी शाखाएँ आज संपूर्ण विश्व तक फैल रही हैं।
दीनदयाल उपाध्याय का नाम आते ही भारतीय राजनीति और समाज-चिंतन की एक विशिष्ट धारा स्मरण में आ जाती है, जो पश्चिम के भौतिकवादी विचारों से अलग, मनुष्य को उसकी संपूर्णता में देखने का आग्रह करती है। उनका एकात्म मानववाद इस बात पर जोर देता है कि समाज, राष्ट्र और व्यक्ति तीनों एक-दूसरे से अलग नहीं हैं; वे एक-दूसरे के पूरक, सहायक और परस्पर जुड़े हुए आयाम हैं।
विज्ञान भवन में आयोजित यह सम्मेलन उसी दर्शन की वैश्विक प्रतिध्वनि था। उद्घाटन सत्र में उपस्थित लद्दाख के उपराज्यपाल कवींद्र गुप्ता ने ठीक ही कहा कि आज भारत की सरकार मानव-केंद्रित विकास के मॉडल पर कार्य कर रही है, जो दीनदयाल जी के विचारों का ही प्रत्यक्ष अनुप्रयोग है।
गृह राज्य मंत्री अजय कुमार मिश्र ‘टेनी’ ने पंडित उपाध्याय को एक ऐसे दार्शनिक के रूप में प्रस्तुत किया, जिन्होंने राजनीति को शुचिता, सत्य और सांस्कृतिक नैतिकता से जोड़ने का प्रयास किया। उन्होंने गृहमंत्रालय में भारतीय भाषा विभाग की स्थापना का उल्लेख कर यह भी याद दिलाया कि पंडित उपाध्याय की दृष्टि में मातृभाषा केवल अभिव्यक्ति का माध्यम नहीं, बल्कि सांस्कृतिक आत्मा का आधार है।
आचार्य यर्लगड्डा लक्ष्मीप्रसाद ने अपने उद्बोधन में कहा कि राष्ट्र और मानवता को पूरक मानने का जो विचार उपाध्याय जी ने दिया, वह आज विश्व को आवश्यक मार्गदर्शन प्रदान कर सकता है। यह कथन आज उस समय और अधिक सार्थक हो जाता है जब वैश्विक परिदृश्य में युद्ध, हिंसा, आर्थिक असमानता और सांस्कृतिक संघर्ष बढ़ रहे हैं।
राष्ट्रीय महासचिव डॉ. विपिन कुमार का यह कथन कि— “यह सम्मेलन हिंदी की शक्ति और भारत की विचारधारा की वैश्विक स्वीकृति का प्रमाण है”— वस्तुतः आयोजन की आत्मा को अभिव्यक्त करता है।
सम्मेलन की प्रमुख विशेषता यह रही कि इसमें केवल दार्शनिक विमर्श ही नहीं हुआ, बल्कि हिंदी को वैश्विक भाषा के रूप में स्थापित करने की दिशा में भी गंभीर चर्चाएँ हुईं। विज्ञान भवन में उपस्थित इथोपिया, सूरीनाम, अमेरिका, जापान, चीन और ऑस्ट्रेलिया के प्रतिनिधियों ने यह स्पष्ट किया कि आज हिंदी सिर्फ भारत की भाषा नहीं, वैश्विक सांस्कृतिक संवाद का सशक्त माध्यम बन चुकी है।
सूरीनाम की उच्चायुक्त सुनैना मोहन का यह कथन कि—
“हमारे देश में आज भी हिंदी और भोजपुरी बोली जाती है; भोजन, भजन, संस्कृति और रामचरितमानस की परंपरा जीवित है”—हिंदी की वैश्विक सांस्कृतिक शक्ति का प्रमाण है।
इथोपिया दूतावास के प्रतिनिधि गेब्रु टेकले ने भारत को अपना “दूसरा घर” बताया और कहा कि हजारों वर्षों से भारत–इथोपिया के संबंध ज्ञान और संस्कृति पर आधारित रहे हैं।
वहीं अमेरिका, जापान और ऑस्ट्रेलिया से आए विद्वानों—डॉ. मधु खन्ना, डॉ. मृदुल कीर्ति, कादंबरी शंकर, डॉ. विवेक मणि त्रिपाठी सहित अनेक शोधकर्ताओं—ने कहा कि हिंदी वैश्वीकरण के दौर में भारतीय सभ्यता का सांस्कृतिक सेतु बन चुकी है।
दूसरे दिन सम्मेलन के आठ सत्रों ने आयोजन को वास्तविक अकादमिक ऊँचाई प्रदान की। एकात्म मानववाद, दीनदयाल और संस्कृति-दर्शन, वैश्विक हिंदी, पर्यावरण, जीवन-दर्शन, समाज-चिंतन और पत्रकारिता जैसे विषयों पर सौ से अधिक शोधपत्रों का प्रस्तुतिकरण इस बात का सूचक है कि पंडित दीनदयाल उपाध्याय के विचार केवल ऐतिहासिक महत्व के नहीं हैं, बल्कि आधुनिक समय के अध्ययन और अनुसंधान के लिए भी अत्यंत प्रासंगिक हैं।
प्रत्येक सत्र में युवा शोधार्थियों और विद्वानों की सक्रिय भागीदारी ने यह विश्वास उत्पन्न किया कि भारतीय दार्शनिक परंपरा केवल संरक्षण में नहीं, बल्कि विस्तार में विश्वास रखती है। यह सम्मेलन नए विचारों, नए शोध और नए दृष्टिकोणों का ऐसा मंच बना जिसने पंडित उपाध्याय की विचार-धारा के नवोन्मेषी आयामों को प्रकाश में लाया।
विशिष्ट अतिथियों की उपस्थिति ने इस आयोजन को प्रशासनिक और नीतिगत दृष्टि से भी महत्त्वपूर्ण बना दिया।
पूर्व मुख्य सचिव दुर्गाशंकर मिश्र ने कहा कि नई शिक्षा नीति 2020 में जो भारतीय भाषाओं और ज्ञान-परंपरा का सम्मान दिखाई देता है, वह दीनदयाल जी की मूल प्रेरणा का ही विस्तार है।
राज्यसभा सांसद रेखा शर्मा ने भाषा और संस्कृति को मनों को जोड़ने वाला सेतु बताया और कहा कि हिंदी विश्व में भारतीय पहचान की ध्वजा बनती जा रही है।
पूर्व सांसद के. सी. त्यागी ने अंग्रेज़ी के अत्यधिक दबाव को समाप्त कर भारतीय भाषाओं के आत्मविश्वास को बढ़ाने की आवश्यकता पर बल दिया।इन वक्तव्यों ने सम्मेलन के संदेश को और स्पष्ट किया कि भारत की उभरती हुई शिक्षा नीति, सांस्कृतिक रणनीति और वैश्विक भूमिका में पंडित दीनदयाल उपाध्याय का दर्शन मौलिक आधार प्रदान कर रहा है।
समापन सत्र में विश्व हिंदी परिषद द्वारा उन विद्वानों, रचनाकारों और संस्थाओं को सम्मानित किया गया जिन्होंने हिंदी और दीनदयाल उपाध्याय के संदर्भ में विशिष्ट कार्य किए हैं। यह सम्मान केवल व्यक्तिगत उपलब्धियों का नहीं था, बल्कि उस राष्ट्रीय चेतना का अभिनंदन था जो भाषा, संस्कृति और राष्ट्रदर्शन को एक साथ लेकर चलती है।
राष्ट्रीय अध्यक्ष आचार्य यर्लगड्डा लक्ष्मीप्रसाद, राष्ट्रीय महासचिव डॉ. विपिन कुमार, राष्ट्रीय उपाध्यक्ष श्री डी. पी. मिश्र, राष्ट्रीय समन्वयक डॉ. श्रवण कुमार तथा अनेक विशिष्ट शिक्षाविदों की उपस्थिति इस सम्मान समारोह को प्रेरणादायी बनाती है।इस सम्मेलन ने यह सिद्ध किया कि भारत की वास्तविक शक्ति उसकी सांस्कृतिक कूटनीति में निहित है।
यह कूटनीति तलवार या संधि-वार्ता से नहीं, बल्कि भाषा, साहित्य, दर्शन और मानवता के भाव से संचालित होती है।
दीनदयाल उपाध्याय का एकात्म मानववाद आज उस सांस्कृतिक कूटनीति का बौद्धिक आधार बन सकता है, जो विश्व को संघर्ष और विभाजन से निकालकर सहयोग और सहअस्तित्व की ओर ले जाए।
विज्ञान भवन में उपस्थित विदेशी प्रतिनिधियों ने बार-बार इस बात को स्वीकार किया कि भारत का सांस्कृतिक मॉडल, उसके मूल्य और उसका मानवतावादी दृष्टिकोण 21वीं सदी के लिए अत्यंत आवश्यक हैं।
दो दिवसीय यह आयोजन कई महत्वपूर्ण संदेश देकर समाप्त हुआ—एकात्म मानववाद आज भी पूरी तरह प्रासंगिक है।यह विकास की उस अवधारणा को प्रस्तुत करता है जिसमें मनुष्य केंद्र में है, न कि केवल संसाधन या बाजार।हिंदी वैश्विक विमर्श की उभरती हुई भाषा है।यह भाषा न केवल सांस्कृतिक पहचान का साधन है, बल्कि भारत के वैश्विक प्रभाव का सशक्त माध्यम भी है।भारतीय दर्शन विश्व के लिए समाधान प्रस्तुत कर सकता है।
दीनदयाल का दर्शन युद्ध, विषमता, अलगाववाद, भौतिकवाद और सांस्कृतिक विखंडन के वर्तमान संकटों से उबरने का मार्ग प्रदान करता है।भारत की युवा पीढ़ी इस विचार-धारा को आगे बढ़ा रही है।
सौ से अधिक शोधपत्रों का प्रस्तुतिकरण इस बात का प्रमाण है कि युवा अब भारतीय दार्शनिक परंपरा के प्रति नया विश्वास रखता है।
विज्ञान भवन का यह भव्य सम्मेलन केवल दो दिनों के संवाद तक सीमित नहीं है; यह आने वाले वर्षों की वैचारिक यात्रा का प्रारंभ-बिंदु है। यह आयोजन बताता है कि भारत अब केवल विश्व की आर्थिक या राजनीतिक शक्ति नहीं, बल्कि सांस्कृतिक मार्गदर्शक शक्ति बनने की ओर अग्रसर है।
पंडित दीनदयाल उपाध्याय का एकात्म मानववाद—मानवता, राष्ट्र, संस्कृति, भाषा और आत्मिक विकास—
इन सभी के समन्वय का ऐसा मॉडल प्रस्तुत करता है जिसकी आज संपूर्ण विश्व को आवश्यकता है।हिंदी का बढ़ता वैश्विक प्रभाव, भारतीय विचार का पुनरुत्थान, और अंतरराष्ट्रीय सहभागिता—ये सभी इस बात के सूचक हैं कि 21वीं सदी केवल तकनीक की नहीं, बल्कि विचारों की भी होगी। और इन विचारों में भारत का योगदान निर्णायक रहेगा।वास्तव में, विज्ञान भवन में गूँजी यह अनुगूँज केवल स्मरण नहीं थी—यह घोषणा थी उस भारत की, जो अपने मूल्यों, दर्शन और मानवतावादी दृष्टि से विश्व का मार्गदर्शन करने का आत्मविश्वास रखता है।