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“धर्मेन्द्र प्रधान की पहल: इतिहास अब सिर्फ अतीत नहीं, राष्ट्रबोध का माध्यम” – 29.07.2025 (दैनिक भास्कर)

भारत एक प्राचीन और समृद्ध सभ्यता है — यहाँ इतिहास केवल अतीत की जानकारी नहीं, बल्कि सांस्कृतिक आत्मबोध और राष्ट्रीय चेतना का वाहक रहा है। किंतु स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद लंबे समय तक देश में इतिहास शिक्षण की जो प्रवृत्ति बनी, उसने छात्रों को घटनाओं और तिथियों के विवरण तक सीमित कर दिया। यह शिक्षा उन्हें न तो अपनी सभ्यता से जोड़ पाई, न ही राष्ट्रीय अस्मिता की अनुभूति करा सकी।

दरअसल, इतिहास का उद्देश्य मात्र यह बताना नहीं है कि क्या हुआ, बल्कि यह समझाना है कि क्यों हुआ और उसका आज तथा कल से क्या संबंध है। इतिहास एक ऐसा औज़ार है जो भावी पीढ़ियों में आत्मसम्मान, विवेक और जिम्मेदार नागरिकता का भाव विकसित करता है। इस दृष्टिकोण के अभाव ने भारतीय शिक्षा प्रणाली को लंबे समय तक एक अकादमिक ढांचे में बाँधकर रखा।

औपनिवेशिक काल में इतिहास लेखन एक रणनीतिक औजार बन गया था — भारतीय समाज की सांस्कृतिक जड़ों को कमज़ोर करने के लिए। ब्रिटिश इतिहासकारों ने भारत की आत्मा को समझने की बजाय विदेशी दृष्टिकोण से उसका चित्रण किया। उन्होंने आक्रांताओं के विवरण को प्राथमिकता दी, जबकि भारतीय ज्ञान परंपरा, साहित्य, विज्ञान, लोक संस्कृति और सामाजिक संरचना की उपेक्षा की गई। परिणामस्वरूप यह भ्रांति फैली कि भारत को ‘खोजा’ गया, और भारत की अपनी उपलब्धियाँ कहीं पीछे छूट गईं।

इतिहास शिक्षण की इस एकांगी परंपरा में भारतीय भाषाओं में रचित ग्रंथों, जनजातीय समुदायों की परंपराओं, महिलाओं की भूमिका, और विविधता में एकता के मूल्य जैसे अनगिनत पहलू उपेक्षित रहे। यह विडंबना ही है कि 11वीं से 17वीं शताब्दी तक भारत में 45,000 से अधिक ग्रंथ लिखे गए, परंतु उन्हें इतिहास की पुस्तकों में स्थान नहीं मिला। वहीं आदिवासी और वंचित समुदायों का ऐतिहासिक योगदान, जो भारत के सामाजिक और सांस्कृतिक ताने-बाने में केंद्रीय रहा है, वह लगभग अदृश्य बना रहा।परंतु अब यह स्थिति बदल रही है।

केंद्रीय शिक्षा मंत्री श्री धर्मेन्द्र प्रधान के नेतृत्व में इतिहास शिक्षण की दिशा को नए सिरे से परिभाषित किया जा रहा है। उनका स्पष्ट मत है कि शिक्षा केवल रोजगार प्राप्ति का साधन नहीं, बल्कि राष्ट्र निर्माण का आधार है। इसी सोच के तहत राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 को तैयार किया गया — एक ऐसी नीति जो ज्ञान को जड़ों से जोड़ने, बहु-आयामी दृष्टिकोण को अपनाने और भारत को भारत की दृष्टि से समझने पर बल देती है।

श्री प्रधान का यह विचार विशेष रूप से उल्लेखनीय है कि इतिहास को विद्यार्थियों के आत्मबोध और राष्ट्रबोध से जोड़ना चाहिए। इसके अंतर्गत केवल तथ्यों का संकलन नहीं, बल्कि इतिहास के पीछे के विचार, मूल्य और दृष्टिकोण को उजागर करना ज़रूरी है। उन्होंने बार-बार यह कहा है कि भारत के इतिहास में नवाचार, विज्ञान, वीरता, लोक परंपराएं और दर्शन की परतें हैं — जिन्हें सामने लाने की आवश्यकता है।

इस दिशा में NCERT की भूमिका निर्णायक रही है। शिक्षा मंत्रालय के मार्गदर्शन में NCERT ने इतिहास की पाठ्यपुस्तकों के पुनर्लेखन की व्यापक प्रक्रिया शुरू की है। विशेषज्ञ समितियाँ यह सुनिश्चित कर रही हैं कि पाठ्यक्रम अधिक समावेशी, प्रेरक और यथार्थपरक बने। neglected क्षेत्रों जैसे — आदिवासी समाज, स्त्रियों का योगदान, क्षेत्रीय नायक, भारत की वैज्ञानिक विरासत — को अब उचित स्थान मिलने लगा है।

इतिहास को जीवंत और संवादात्मक बनाने हेतु NCERT द्वारा डिजिटल सामग्री, स्थानीय भाषाओं में संसाधन, और क्षेत्रीय सांस्कृतिक अनुभवों को पाठ्यचर्या में समाहित करने के प्रयास भी सराहनीय हैं। यह एक ऐसा परिवर्तन है, जो विद्यार्थियों को न केवल पाठ याद रखने तक सीमित नहीं रखेगा, बल्कि उन्हें एक आत्मविश्वासपूर्ण और विवेकशील नागरिक बनाने की दिशा में प्रेरित करेगा।

यह परिवर्तन ऐसे समय में और भी प्रासंगिक हो जाता है, जब भारत वैश्विक मंच पर अपनी भूमिका सशक्त रूप से निभा रहा है। जब पूरी दुनिया भारत को नई दृष्टि से देख रही है, तब भारत को भी स्वयं को समझने और प्रस्तुत करने का दृष्टिकोण बदलना होगा। इतिहास शिक्षा को प्रेरक बनाना — यानी वह इतिहास पढ़ाना जो पराजय नहीं, संभावनाओं की कथा कहे — यही आज की आवश्यकता है।

संपादकीय के रूप में हम यह रेखांकित करना चाहते हैं कि इतिहास को लेकर दृष्टिकोण में यह परिवर्तन केवल एक पाठ्यपुस्तक सुधार नहीं, बल्कि राष्ट्र निर्माण की प्रक्रिया का हिस्सा है। भारत की युवा पीढ़ी को वह इतिहास पढ़ाया जाना चाहिए जो न केवल उनके बौद्धिक विकास का साधन हो, बल्कि उनके आत्मबोध और राष्ट्रभक्ति का भी स्रोत बने।

शिक्षा मंत्री श्री धर्मेन्द्र प्रधान और NCERT के इस प्रयास का स्वागत किया जाना चाहिए। साथ ही यह भी अपेक्षा की जानी चाहिए कि राज्य सरकारें, शैक्षणिक संस्थान, शिक्षक और समाज मिलकर इस नई सोच को जमीनी स्तर तक पहुंचाएं। यह केवल एक नीतिगत परिवर्तन नहीं, बल्कि भारत को आत्मनिर्भर और आत्मगौरव से पूर्ण राष्ट्र बनाने की नींव है।