भारतीय शिक्षा को भारतीय ज्ञान परंपरा के रूप में ढालने की पहल ने समाज में गहरे और विचारोत्तेजक प्रश्न उठाए हैं। भारतीयता की परिभाषा क्या है? वर्तमान शिक्षा प्रणाली में ऐसी क्या कमियां हैं, जो इसे भारतीय मूल्यों से विमुख करती हैं? भारतीय ज्ञान परंपरा का स्वरूप और उसकी विशेषता क्या है, जो इसे अन्य परंपराओं से अलग करती है? ये प्रश्न आज के ज्ञान-युग में इसलिए प्रासंगिक हैं, क्योंकि यह केवल शिक्षा का विषय नहीं, बल्कि समाज की सोच, व्यवहार और सांस्कृतिक अस्मिता का प्रश्न है।
आज की शिक्षा प्रणाली में आलोचनात्मक चिंतन और सृजनात्मकता का अभाव एक गंभीर चिंता है। राजनीति में बढ़ता दिखावा, मानवीय मूल्यों का क्षरण, न्याय व्यवस्था में सुधारों की कमी और नागरिक जीवन की अव्यवस्थाएं इस बात की ओर इशारा करती हैं कि शिक्षा में आमूल-चूल परिवर्तन अपरिहार्य है। नई शिक्षा नीति 2020 के बाद पाठ्यक्रमों में भारतीय ज्ञान परंपरा को शामिल करने की एक बेहतरीन शुरुआत हुई है। यदि हम पश्चिमी ज्ञान के खर्चीले, दिशाहीन और आयातित प्रभावों से मुक्ति चाहते हैं, तो शिक्षा में भारतीय दृष्टिकोण को अपनाना अनिवार्य है। मानसिक स्वराज और आत्मनिर्भर भारत के निर्माण के लिए भारतीय ज्ञान परंपरा का पुनर्जनन आवश्यक है। औपनिवेशिक मानसिकता ने देश की बौद्धिक और सांस्कृतिक नींव को गहराई से प्रभावित किया है, और इस परंपरा का पुनरुत्थान न केवल भारत, बल्कि वैश्विक कल्याण के लिए भी लाभकारी होगा और नयी शिक्षा नीति में इस पर अत्यंत बल दिया गया है।
पश्चिमी ज्ञान मॉडल की सीमाएं अब स्पष्ट हैं। हिंसा, जलवायु परिवर्तन, पर्यावरण प्रदूषण, और बाजार का बढ़ता वर्चस्व इसके खोखलेपन को उजागर करते हैं। इसके विपरीत, भारतीय ज्ञान परंपरा मनुष्य को प्रकृति का शोषक नहीं, बल्कि उसका अभिन्न अंग मानती है। यह समग्र, अंत:संबंधित और नैतिकता पर आधारित है, जिसमें न्याय, मीमांसा, आयुर्वेद, और योग जैसी विधाएं तर्क, अनुभव और परस्पर पूरकता के साथ विकसित हुई हैं। यह परंपरा ज्ञान को सामाजिक संदर्भ और नैतिकता से जोड़ती है, जो आधुनिक विज्ञान को पूर्णता प्रदान करती है।
भारतीय ज्ञान परंपरा जीवंत और विकासशील है, जो लोक-जीवन, जनजातियों और ग्रामीण परंपराओं में बिखरी पड़ी है। पर्यावरण संरक्षण, औषधीय ज्ञान, और सांस्कृतिक परंपराएं इसके उदाहरण हैं, जो दस्तावेजीकरण और संरक्षण के अभाव में नष्ट हो रही हैं। निःसंदेह नई राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 में मातृभाषा में शिक्षा के साथ, संस्कृति, परंपरा और आधुनिकता को भी अत्यंत प्रोत्साहन मिला है। यह एक ऐसा प्रयास है, जिससे छात्रों की वैचारिक, तार्किक, विश्लेषण और शोध क्षमता को एक नई ऊँचाई मिलेगी, यह चिन्ता किये बगैर कि वह किस सामाजिक-आर्थिक पृष्ठभूमि से वास्ता रखता है।
किसी दौर में छात्रों को अच्छी शिक्षा के लिए दर-दर भटकना पड़ता था। विभाग में भ्रष्टाचार अपने चरम पर थी और उच्च शिक्षण संस्थानों पर देश के संपन्न परिवारों का कब्जा था। लेकिन, बीते एक दशक में ही प्रधानमंत्री मोदी ने इस भीषण दुष्चक्र को पूरी तरह से तोड़ कर रख दिया है। इसी का परिणाम है कि 2011 में जो ग्रामीण साक्षरता दर केवल 67.77% थी, उसका दायरा आज 77.50% हो गया। वहीं, महिला साक्षरता की दर 57.93% के मुकाबले 70.40% और पुरुष साक्षरता दर 77.15% के मुकाबले 84.7% है।
21वीं सदी भारत की सदी है और इस कालखंड में अपनी पूरी क्षमता के साथ आगे बढ़ने के लिए शिक्षा का समावेशी होने अनिवार्य है। प्रधानमंत्री मोदी इसी सोच के साथ आगे बढ़ रहे हैं। शिक्षा क्षेत्र में इन सफलताओं के लिए शिक्षा मंत्री धर्मेन्द्र प्रधान और शिक्षा सचिव विनीत जोशी जैसे अधिकारियों का भी बड़ा योगदान है, जिन्होंने अपनी कर्तव्यनिष्ठा से नीतियों को मूर्त रूप देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभायी है। आँकड़े बताते हैं कि आज़ादी के 70 वर्षों के बाद, देश में केवल 7 एम्स थे। लेकिन, आज इसकी संख्या 23 हो चुकी है। आज़ादी के 70 वर्षों में देश मे केवल 387 मेडिकल कॉलेज थे। लेकिन आज इसकी संख्या 700 से भी अधिक हो चुकी है। पहले देश में एमबीबीएस की केवल 51 हजार सीटें थीं, जो आज दोगुनी हो चुकी है। बीते 10 वर्षों में देश को 7 नये आईआईटी मिले हैं और सार्वजनिक विश्वविद्यालयों की संख्या 316 से बढ़कर 480 से भी अधिक हो गई। वहीं, पहले देश में 38 हजार कॉलेज थे, जो अब बढ़कर 53 हजार से भी अधिक हो गए हैं।
कहने की आवश्यकता नहीं है कि पहले सुदूरवर्ती क्षेत्रों में शिक्षा की स्थिति अत्यंत नाजुक थी। पूर्व के सरकारों ने उन्हें अपने हाल पर छोड़ दिया था। लेकिन, प्रधानमंत्री मोदी ने एक दूरदर्शी सोच के साथ डिजिटल इंडिया मिशन, नई शिक्षा नीति, बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ योजना, पीएम श्री योजना, विद्यालक्ष्मी योजना, उल्लास योजना जैसे पहलों को शुरू किया, जिससे आज शिक्षा के साथ कौशल विकास को एक नई ऊँचाई मिल रही है। प्रधानमंत्री मोदी ने शिक्षा व्यवस्था में अपने अनगिनत सुधारात्मक प्रयासों से एक समृद्ध और ज्ञान-संचालित भविष्य के लिए एक सशक्त आधारशिला का निर्माण किया है। आज हम वर्ष 2047 तक ‘विकसित भारत’ के जिस संकल्प के साथ आगे बढ़ रहे हैं, तब बेहतर शिक्षा व्यवस्था के इन प्रयासों से हमें एक नई ऊर्जा मिलती है।
हालांकि हमें आगे शिक्षा में वाचिक परंपराओं और लोक-ज्ञान को शामिल करना होगा। भारतीय ज्ञान परंपरा शरीर, मन और पर्यावरण के संतुलन पर बल देती है, जो हमारी सभ्यता के उत्कर्ष का आधार बन सकती है। इसे पुनर्जनन के लिए समावेशी और लोकतांत्रिक दृष्टिकोण अपनाना होगा। यह एक बौद्धिक पुनर्जागरण का अवसर है, जो हमें औपनिवेशिक मानसिकता से मुक्ति दिला सकता है। साहस और विवेक के साथ इस दिशा में कदम उठाना भारत और विश्व के लिए एक सशक्त भविष्य का निर्माण करेगा।