विश्व हिंदी दिवस केवल एक तिथि नहीं, बल्कि हिंदी की जीवंत सांस्कृतिक चेतना, उसकी वैश्विक स्वीकृति और भारत की वैचारिक विरासत का उत्सव है। इसी भावना को साकार करते हुए विश्व हिंदी परिषद के तत्वावधान में आयोजित गरिमामय सम्मेलन ने हिंदी के सांस्कृतिक, शैक्षणिक और वैश्विक महत्व को सशक्त रूप से प्रस्तुत किया।
सम्मेलन का शुभारंभ परिषद के राष्ट्रीय महासचिव डॉ. विपिन कुमार के ओजस्वी स्वागत भाषण से हुआ। अपने संबोधन में उन्होंने हिंदी को केवल भाषा नहीं, बल्कि भारत की आत्मा, संस्कृति और वैश्विक संवाद का सेतु बताया। डॉ. कुमार ने हिंदी को “मानवता, शांति और वसुधैव कुटुम्बकम” की संवाहक भाषा बताते हुए इसकी वैश्विक पहचान पर जोर दिया। उनके विचारों ने उपस्थित अतिथियों एवं श्रोताओं को हिंदी की व्यापक भूमिका और उसकी वैश्विक महत्ता के प्रति जागरूक किया।
कार्यक्रम का सबसे विशेष आकर्षण परिषद का ध्येयगीत रहा। इस गीत की रचना डॉ. विपिन कुमार ने की और इसकी सजीव प्रस्तुति प्रख्यात संगीतकार गायत्री जी ने दी। गीत के उद्घोष “जयति जय जय – विश्व भाषा हिंदी! हिंदी है हम – विश्व भाषा हमारी!” ने सभागार को हिंदीमय वातावरण से भर दिया। इस ध्येयगीत में भारत की भाषायी विविधता, सांस्कृतिक एकता, मानवता, शांति और विश्व गुरु भारत के संकल्प को भावपूर्ण और प्रभावशाली ढंग से प्रस्तुत किया गया।कार्यक्रम का कुशल संयोजन डॉ. रश्मि सलूजा द्वारा किया गया। उन्होंने अल्प समय में ध्येयगीत सहित संपूर्ण आयोजन को सुव्यवस्थित, भव्य और प्रभावशाली रूप से संपन्न कराने में महत्वपूर्ण योगदान दिया।
सम्मेलन की अध्यक्षता भारत सरकार के पूर्व केंद्रीय मानव संसाधन विकास मंत्री डॉ. मुरली मनोहर जोशी ने की। अपने अध्यक्षीय वक्तव्य में उन्होंने हिंदी को राष्ट्रनिर्माण की आधारशिला बताया और इसके वैश्विक प्रसार हेतु निरंतर, संगठित प्रयासों की आवश्यकता पर बल दिया। उनका मानना था कि हिंदी न केवल संवाद का माध्यम है, बल्कि भारतीय संस्कृति और वैचारिक दृष्टिकोण को विश्व स्तर पर पहुंचाने का सबसे प्रभावी उपकरण है।
मुख्य अतिथि, श्री सुनील अम्बेकर, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के राष्ट्रीय प्रचार प्रमुख ने कहा कि “हिंदी समाज को जोड़ने वाली सांस्कृतिक शक्ति है।”उन्होंने हिंदी को जन-जन की भाषा बताते हुए इसे सामाजिक समरसता, राष्ट्रीय एकता और सांस्कृतिक आत्मबोध का सशक्त माध्यम बताया। उनके विचारों ने हिंदी की सामाजिक और सांस्कृतिक भूमिका को गहराई से रेखांकित किया।
सम्मेलन में राज्यसभा सांसद श्री सुधांशु त्रिवेदी ने कहा कि हिंदी केवल संवाद का माध्यम नहीं है, बल्कि यह भारत की वैचारिक स्वतंत्रता और सांस्कृतिक आत्मसम्मान की अभिव्यक्ति भी है। उन्होंने हिंदी के माध्यम से भारतीय दर्शन, जीवन-मूल्यों और बौद्धिक परंपरा को वैश्विक मंच पर प्रतिष्ठित करने पर जोर दिया। वहीं, राज्यसभा सांसद डॉ. संगीता बलवंत ने परिषद द्वारा नई पीढ़ी को हिंदी से जोड़ने के प्रयासों की सराहना की और इसे भाषा के अंतरराष्ट्रीय विस्तार की दिशा में महत्वपूर्ण बताया।
अंतरराष्ट्रीय स्तर पर हिंदी की बढ़ती स्वीकार्यता को रेखांकित करते हुए नेपाल के राजदूत श्री शंकर प्रसाद शर्मा, उज्बेकिस्तान के राजदूत श्री सरदार रुस्तमवायेव और गुयाना के राजदूत श्री धरम जी की उपस्थिति ने कार्यक्रम को वैश्विक गरिमा प्रदान की। वित्त मंत्रालय के संयुक्त सचिव श्री बलदेव पुरुषार्थ की भागीदारी ने इसे नीतिगत दृष्टि से भी महत्वपूर्ण बनाया।
परिषद के राष्ट्रीय समन्वयक डॉ. श्रवण जी ने परिषद पंचांग, संवाद और समन्वय में विशेष भूमिका निभाई, जिसके लिए उन्हें विशेष धन्यवाद ज्ञापित किया गया।
सफल संचालन डॉ. प्रीति तोमर द्वारा किया गया और संपूर्ण आयोजन का समन्वय डॉ. हर्ष बाला ने संभाला। दिल्ली प्रांत के उपाध्यक्ष दीनदयाल और प्रतिभा राणा सहित सभी सहयोगियों के सामूहिक प्रयासों से यह आयोजन अत्यंत सफल, गरिमामय और सार्थक सिद्ध हुआ।
सम्मेलन में आईसीपीआर सदस्य प्रो. सच्चिदानंद मिश्रा, डॉ. पूजा व्यास, केंद्रीय हिंदी संस्थान के निदेशक डॉ. सुनील कुलकर्णी, हंसराज महाविद्यालय की प्रो. रमा शर्मा, पी.जी.डी.ए.वी. महाविद्यालय के प्राचार्य प्रो. आर.के. गुप्ता और भारतीय योग संस्थान के अध्यक्ष श्री देशराज सहित अनेक शिक्षाविद्, विद्वान और गणमान्य अतिथियों की गरिमामय उपस्थिति रही।
विश्व हिंदी परिषद ने प्रतियोगिताओं के आयोजन के माध्यम से भावी पीढ़ी को हिंदी के प्रति प्रेरित करने के प्रयासों की भी सराहना की। अल्प सूचना के बावजूद प्रतियोगिताओं के सफल आयोजन हेतु डॉ. सविता जैमिनी, डॉ. रेखा शर्मा, डॉ. संगीता त्यागी, डॉ. लक्ष्मी, डॉ. झबलू राम, डॉ. योजना कालिया और डॉ. अमिता तिवारी को हार्दिक शुभकामनाएँ एवं साधुवाद दिया गया।
कार्यक्रम के अंत में परिषद के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष श्री देवी प्रसाद मिश्र द्वारा भावपूर्ण धन्यवाद ज्ञापन प्रस्तुत किया गया। उनके समापन शब्दों के साथ यह गरिमामय सम्मेलन सफलतापूर्वक संपन्न हुआ और हिंदी को वैश्विक मंच पर प्रतिष्ठित करने के प्रयासों में एक नई ऊर्जा का संचार किया।
इस प्रकार, यह सम्मेलन विश्व हिंदी दिवस के उद्देश्य — हिंदी को सांस्कृतिक, वैचारिक और वैश्विक चेतना के रूप में प्रस्तुत करना — को साकार करने में अत्यंत सफल रहा। विश्व हिंदी परिषद के माध्यम से हिंदी केवल भाषा नहीं, बल्कि समाज और संस्कृति को जोड़ने वाली अद्भुत शक्ति के रूप में उभरती दिखाई दी।