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नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में सांस्कृतिक राष्ट्रवाद का उदय – 15.07.2025 (दैनिक भास्कर)

सदियों तक भारत की चेतना पर विदेशी शासन की गहरी परछाई रही—पहले मुगलों का प्रभुत्व और फिर ब्रिटिश साम्राज्य का शिकंजा। इन दोरों के प्रभाव ने हमारी शिक्षा व्यवस्था, प्रशासनिक ढांचे और सांस्कृतिक पहचान को भीतर तक प्रभावित किया। परिणामस्वरूप, स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद भी मानसिक गुलामी की जड़ें समाज में बनी रहीं। आत्मविश्वास की कमी और राष्ट्रीय चेतना के अभाव ने भारत को लंबे समय तक पश्चिमी सोच के पीछे चलने को मजबूर किया, जिससे अपनी परंपराएं, भाषा और सांस्कृतिक धरोहर हाशिए पर चली गईं।

लेकिन 2014 के बाद प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में एक नए विचार भारत की धारा में प्रवेश करता है—एक ऐसी सोच जो आत्मनिर्भरता, सांस्कृतिक गौरव और राष्ट्र प्रथम की भावना को केंद्र में रखती है। इस बदलाव की नींव है “पंच प्रण” — पांच संकल्प जो भारत के पुनरुत्थान की दिशा तय करते हैं: एक विकसित भारत का निर्माण, गुलामी की मानसिकता से मुक्ति, अपनी समृद्ध विरासत पर गर्व, राष्ट्रीय एकता का सशक्तिकरण, और नागरिक कर्तव्यों के प्रति जागरूकता। यह केवल राजनीतिक दिशा नहीं, बल्कि सांस्कृतिक पुनर्जागरण का आह्वान है।
इनमें से दूसरा और तीसरा प्रण खासतौर पर हमारी सांस्कृतिक आज़ादी से जुड़े हैं। इनका उद्देश्य है भारतीयों के मन को गुलामी की सोच से आजाद करना और हमारी अपनी परंपराओं में फिर से विश्वास पैदा करना।

औपनिवेशिक प्रभावों को मिटाने का प्रयास प्रतीकात्मक और व्यवस्थित दोनों है, जो भारत की पहचान को आत्मसम्मान और सांस्कृतिक संप्रभुता की ओर ले जा रहा है। सबसे उल्लेखनीय परिवर्तन था राजपथ का नाम बदलकर कर्तव्यपथ करना, जो कर्तव्य को विशेषाधिकार पर प्राथमिकता देता है। यह बदलाव भारत की पहचान को अपनी शर्तों पर फिर से परिभाषित करने के व्यापक इरादे को दर्शाता है। इसी तरह, भारतीय नौसेना के ध्वज से औपनिवेशिक सेंट जॉर्ज क्रॉस हटाकर राष्ट्रीय ध्वज और नीले-सुनहरे अष्टकोण वाला डिजाइन अपनाया गया, छत्रपति शिवाजी महाराज की मुहर से प्रेरणा लेता है, और आठ दिशाओं (चार कार्डिनल और चार इंटर कार्डिनल) का प्रतिनिधित्व करता है एवं भारतीय नौसेना की समुद्री पहुंच का प्रतीक है। 2022 के गणतंत्र दिवस की बीटिंग द रिट्रीट समारोह में, आज़ादी का अमृत महोत्सव के अंतर्गत सितार, संतूर और तबला जैसे भारतीय वाद्ययंत्रों को अपनाया गया, जो देशभक्ति का संचार करता है और औपनिवेशिक परंपराओं को स्वदेशी गर्व से सराबोर करता है।

इस ही में एक और श्रंखला है अंडमान और निकोबार द्वीप समूह की जहां औपनिवेशिक नामकरण को व्यवस्थित रूप से बदला गया। 2018 में, रॉस द्वीप का नाम नेताजी सुभाष चंद्र बोस, नील द्वीप का नाम बदलकर शहीद द्वीप और हैवलॉक द्वीप का नाम स्वराज द्वीप रखा गया, जो नेताजी सुभाष चंद्र बोस के “स्वराज और शहीद” के विचार को सम्मान देता है। 2024 में अंडमान-निकोबार की राजधानी पोर्ट ब्लेयर का नाम बदलकर श्री विजय पुरम किया गया और 21 द्वीपों के नाम भारत के परम वीर चक्र विजेताओं के नाम पर रखे गए, जिससे देश के वीर सैनिकों को सम्मान मिला।

राष्ट्रपति भवन के मुगल उद्यान का नाम भारत के सांस्कृतिक लोकाचार के अनुरूप अमृत उद्यान रखा गया। प्रधानमंत्री निवास वाली रेस कोर्स रोड का नाम लोक कल्याण मार्ग रखा गया है, जो जन-केंद्रित शासन का प्रतीक है। वहीं औरंगज़ेब रोड का नाम बदलकर डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम रोड रखा गया, जो एक महान वैज्ञानिक और भारत रत्न को सच्ची श्रद्धांजलि है।

मोदी सरकार ने औपनिवेशिक बजट परंपराओं को भी अंत किया है । 2017-18 से रेल बजट को आम बजट के साथ पेश किया जाने लगा, जिससे अंग्रेजों की बनाई यह बेतुकी परंपरा खत्म हो गई। 2019 में वित्त मंत्री ने बजट पेश करते समय पुराने ब्रीफकेस की जगह परंपरागत बही खाता का इस्तेमाल किया, जो हमारी स्वदेशी परंपराओं में वापसी का प्रतीक है। उस ही तरह प्रयागराज और अयोध्या जैसे पुराने नामों की वापसी ने भारत को उसकी आध्यात्मिक विरासत से फिर से जोड़ा है । हल ही में तीन नए आपराधिक कानूनों में से एक—भारतीय न्याय संहिता—ने अंग्रेजों की बनाई हुई भारतीय दंड संहिता की जगह ली। ये नए कानून सजा के बजाय न्याय पर जोर देते हैं और हमारे कानूनों को भारतीय सोच और मूल्यों के साथ जोड़ते हैं।

औपनिवेशिक असर को खत्म करने के साथ-साथ, भारत की सांस्कृतिक विरासत को भी फिर से चमकाया जा रहा है। अयोध्या में श्री राम मंदिर की स्थापना ने 500 साल की आकांक्षा और प्रतीक्षा को समाप्त किया, जिससे इतिहास में फैलाई गई गलत कहानियों का अंत हुआ। श्री काशी विश्वनाथ धाम प्रोजेक्ट ने मंदिर और गंगा नदी के बीच एक खुला रास्ता बनाया गया, जिससे प्राचीन तीर्थ परंपरा फिर से जीवित हुई और लाखों श्रद्धालु वहां पहुंचने लगे। पावागढ़ के कालिका माता मंदिर में प्रधानमंत्री मोदी ने करीब 500 साल बाद मंदिर के शिखर पर ध्वज फहराया, जिससे इस पवित्र शक्तिपीठ का गौरव फिर से स्थापित हुआ। इन सफलताओं के लिए केन्द्रीय संस्कृति मंत्री गजेन्द्र सिंह शेखावत, राज्य मंत्री राव इंद्रजीत सिंह के साथ ही, उनके पूर्व मंत्री जी. किशन रेड्डी और मंत्रालय के मुख्य सचिव विवेक अग्रवाल जैसे अधिकारी भी प्रशंसा के पात्र हैं।

सरकार ने भारत के इतिहास में छुपे हुए नायकों को भी सम्मान दिया है। नई दिल्ली में बना राष्ट्रीय युद्ध स्मारक हमारे शहीद सैनिकों को श्रद्धांजलि देता है। दुनिया की सबसे ऊँची प्रतिमा ‘स्टैच्यू ऑफ यूनिटी’ सरदार पटेल को समर्पित है, जिन्होंने देश को एकजुट किया। इंडिया गेट पर नेताजी सुभाष चंद्र बोस की बड़ी प्रतिमा उनके आज़ादी के संघर्ष में योगदान को पहचान देती है। भगवान बिरसा मुंडा की विरासत को उनके जन्मदिन को ‘जनजातीय गौरव दिवस’ घोषित करके और रांची में एक स्मारक बनाकर सम्मान दिया गया है। वीर लचित बोरफूकन और रानी गाइदिन्ल्यू को भी श्रद्धांजलि दी गई है, जिसमें मणिपुर के एक रेलवे स्टेशन का नाम रानी के नाम पर रखा गया है। अंडमान की सेलुलर जेल को वीर सावरकर और अन्य स्वतंत्रता सेनानियों की स्मृति में फिर से विकसित किया गया है।

सांस्कृतिक पुनर्जागरण अब हमारी ऐतिहासिक धरोहर तक भी पहुँच गया है। नए संसद भवन में स्थापित सेंगोल भारत की लोकतांत्रिक और ऐतिहासिक परंपरा का प्रतीक है। 2014 से अब तक 640 से ज्यादा प्राचीन कलाकृतियाँ भारत वापस लाई गई हैं, जो हमारी कला और संस्कृति की समृद्धि को दर्शाती हैं। योग, आयुर्वेद, यूनानी और सिद्ध जैसी पारंपरिक चिकित्सा पद्धतियों को अंतरराष्ट्रीय योग दिवस और आयुष मंत्रालय के जरिए वैश्विक स्तर पर बढ़ावा मिला है।
प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने 2023 में जी-20 की मेजबानी देश के 60 शहरों में कराकर भारत की “विविधता में एकता” की भावना को वैश्विक मंच पर सशक्त रूप से प्रस्तुत किया। गंगा आरती जैसे आध्यात्मिक आयोजनों से लेकर 2025 के महाकुंभ की भव्य तैयारियों तक, भारत ने अपनी सांस्कृतिक शक्ति और परंपराओं की जीवंतता का विश्व को अनुभव कराया।

इन प्रयासों के माध्यम से मोदी सरकार न केवल औपनिवेशिक मानसिकता के अवशेषों को व्यवस्थित रूप से समाप्त कर रही है, बल्कि एक ऐसे भारत का निर्माण भी कर रही है जो आत्मविश्वास से भरा है, और जिसे अपनी सनातन विरासत पर गहरा गर्व है।
जगहों के नामों का पुनर्निर्धारण, लोक परंपराओं का पुनर्जागरण, और उपेक्षित रहे नायकों को सम्मान देना—ये सभी कदम आज के भारत में सांस्कृतिक पुनरुत्थान की प्रतीक बन चुके हैं। यह एक ऐसी जागृति है जो देशवासियों को न केवल अपने इतिहास से जोड़ती है, बल्कि उन्हें एक साझा गर्व और राष्ट्रीय एकता की डोर में भी बांधती है।

इसी संकल्प को आधार बनाकर, पिछले 10 वर्षों में भारत सरकार ने हिन्दी समेत सभी भारतीय भाषाओं को वैश्विक मंच पर स्थापित करने का एक संगठित प्रयास किया है। आधुनिक तकनीकों की मदद से इन्हें प्रशासन, शिक्षा, विज्ञान और जनसंचार के लिए और अधिक उपयोगी, सुलभ और प्रभावी बनाया जा रहा है। कहने की आवश्यकता नहीं है कि हिन्दी ने हमारे स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान भी एक ‘संवाद भाषा’ के तौर पर समाज को पुनर्जागृत करने में एक उल्लेखनीय भूमिका निभायी। इतिहास साक्षी है कि हमारे देश में ‘स्वराज’ प्राप्ति और ‘स्वभाषा’ के आन्दोलन एकसाथ चले। भारतीय भाषाओं की सफलता के लिए प्रधानमंत्री मोदी और गृहमंत्री अमित शाह के साथ, हमारे साथ राज भाषा की सचिव अंशुली आर्या भी प्रशंसा की पात्र हैं।

बहरहाल, सांस्कृतिक स्वतंत्रता का अर्थ केवल अतीत को फिर से लिखना नहीं है, बल्कि एक ऐसे भविष्य की रचना करना है जहाँ भारत अपनी मौलिक पहचान और गौरवशाली विरासत के साथ विश्व मंच पर आत्मविश्वास से खड़ा हो—ना झुका हुआ, ना डरा हुआ, बल्कि पूरी मजबूती से अपने मूल स्वरूप में।