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अमित शाह की पहल और अश्विनी वैष्णव की भूमिका – 22.09.2025 (वीर अर्जुन)

भारत जैसे बहुभाषी और बहुसांस्कृतिक देश में भाषा केवल संचार का माध्यम नहीं है, बल्कि यह हमारी पहचान, संस्कृति, परंपरा और राष्ट्र-चेतना का दर्पण भी है। हिंदी, जिसे भारत की राजभाषा का दर्जा प्राप्त है, सदियों से राष्ट्र की एकता और अखंडता को जोड़ने वाली कड़ी रही है। हालांकि, समय-समय पर यह प्रश्न उठता रहा है कि क्या हिंदी अपनी शुद्धता और मौलिकता के साथ मीडिया, शिक्षा और प्रशासन के क्षेत्र में उतनी प्रभावी है जितनी उसकी क्षमता है। हाल ही में यह बहस और गहराई से सामने आई जब सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय ने कई प्रमुख हिंदी समाचार चैनलों को नोटिस जारी किया। मंत्रालय का आरोप था कि इन चैनलों में उर्दू और फारसी मूल के शब्दों का अत्यधिक प्रयोग हो रहा है, जिससे हिंदी की सहजता और मूल स्वरूप प्रभावित हो रहा है।

यह मामला केवल भाषाई शुद्धता का नहीं, बल्कि राष्ट्रीय अस्मिता, संप्रेषणीयता और प्रशासनिक सफलता का भी है। जब किसी समाचार चैनल का उद्देश्य व्यापक जनमानस तक स्पष्ट और सहज भाषा में संदेश पहुंचाना होता है, तब शब्दावली की शुद्धता और चयन का महत्व अत्यधिक बढ़ जाता है। सोशल मीडिया और विभिन्न समाचार माध्यमों में यह सूचना व्यापक रूप से साझा की गई कि टीवी9 भारतवर्ष, आजतक, एबीपी न्यूज़, ज़ी न्यूज़ और टीवी18 जैसे बड़े चैनलों को औपचारिक नोटिस भेजा गया है। आरोप था कि इन चैनलों की भाषा में लगभग 25–30 प्रतिशत तक उर्दू और फारसी शब्द शामिल हैं।

सूचना एवं प्रसारण मंत्री अश्विनी वैष्णव ने इस मामले में स्पष्ट दृष्टिकोण अपनाया। उन्होंने हाल ही में दूरदर्शन और आकाशवाणी पर “सेवा पर्व” जैसे कार्यक्रमों का शुभारंभ किया, जिनका उद्देश्य राष्ट्र निर्माण में सरकारी नीतियों और योजनाओं की जानकारी आम नागरिक तक सरल और स्पष्ट भाषा में पहुँचाना है। अश्विनी वैष्णव के लिए भाषा केवल संचार का साधन नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक संवाद और जनभागीदारी का अहम औजार है। उनके दृष्टिकोण में यह आवश्यक है कि मीडिया की भाषा स्पष्ट, सरल और जनसुलभ हो, ताकि हर वर्ग का नागरिक उसे बिना किसी बाधा के समझ सके।

इसी क्रम में, हाल ही में आयोजित अखिल भारतीय राजभाषा सम्मेलन ने हिंदी के संरक्षण और संवर्धन को नई दिशा दी। इस सम्मेलन का आयोजन गृह मंत्रालय और राजभाषा विभाग की संयुक्त पहल से किया गया, और इसमें गृह मंत्री श्री अमित शाह ने भाषाई एकता और राष्ट्रभाषा की मजबूती पर विशेष बल दिया। अमित शाह ने सम्मेलन के उद्घाटन सत्र में स्पष्ट रूप से कहा कि हिंदी केवल एक भाषा नहीं, बल्कि भारत की एकता और अखंडता का प्रतीक है। उन्होंने यह भी जोर दिया कि भारतीय भाषाओं के बीच परस्पर आदान-प्रदान होना चाहिए, लेकिन सरकारी और सार्वजनिक संवाद में हिंदी की प्रमुखता को बनाए रखना अनिवार्य है।

सम्मेलन में राजभाषा सचिव अंशुली आर्या ने भी अपने दृष्टिकोण और प्रशासनिक अनुभव के आधार पर हिंदी को सशक्त बनाने के उपायों पर चर्चा की। उन्होंने बताया कि हिंदी का व्यापक प्रसार केवल सांस्कृतिक दृष्टि से नहीं, बल्कि प्रशासनिक कार्यकुशलता और जनसंचार के दृष्टिकोण से भी आवश्यक है। अंशुली आर्या ने स्पष्ट किया कि राजभाषा के संरक्षण में सरकारी संस्थाओं की जिम्मेदारी बढ़ती जा रही है, और उन्हें अपने माध्यमों में हिंदी की शुद्धता और स्पष्टता सुनिश्चित करनी होगी।

गृह मंत्री अमित शाह और राजभाषा सचिव अंशुली आर्या के दृष्टिकोण में यह बात बार-बार उभरकर आई कि भाषा केवल साहित्य या संस्कृति का विषय नहीं है, बल्कि यह राष्ट्रहित और लोकतांत्रिक संवाद का मूलाधार है। अमित शाह ने सम्मेलन में कहा कि हिंदी के सशक्तिकरण से ही राष्ट्रीय संवाद सशक्त होगा, और देशभर में एक समान संदेश का प्रवाह सुनिश्चित किया जा सकेगा। उन्होंने यह भी सुझाव दिया कि मीडिया संस्थानों को अपनी भाषा नीति की समीक्षा करनी चाहिए, ताकि हिंदी का स्वरूप सरल, स्पष्ट और जनसुलभ बना रहे।

सूचना मंत्रालय की इस पहल ने एक गहरी बहस को जन्म दिया है। मीडिया और सोशल मीडिया पर इसे लेकर विभिन्न दृष्टिकोण सामने आए। एक वर्ग ने इसे हिंदी के सम्मान और राष्ट्रभाषा के महत्व के रूप में देखा, जबकि दूसरे वर्ग ने इसे “अत्यधिक कट्टरता” और अनावश्यक नियंत्रण के रूप में आलोचना की। यह बहस स्पष्ट करती है कि भाषा का प्रश्न केवल व्याकरणिक या साहित्यिक नहीं, बल्कि यह राजनीति, संस्कृति और जनमानस से भी जुड़ा हुआ है।

आज़ादी के बाद हिंदी को राजभाषा का दर्जा मिलने के समय यह अपेक्षा की गई थी कि हिंदी मीडिया, साहित्य, प्रशासन और शिक्षा की मुख्य भाषा बनेगी। किंतु समय के साथ हिंदी में उर्दू और अन्य भाषाओं के शब्दों का मिश्रण बढ़ता गया। समाचार-पत्रों, रेडियो और अब टीवी चैनलों ने इस दिशा में गंभीर पहल नहीं की। यही कारण है कि सूचना मंत्रालय और अश्विनी वैष्णव की ओर से उठाया गया कदम अत्यंत महत्वपूर्ण है।

गृह मंत्री अमित शाह ने इस सम्मेलन के माध्यम से यह स्पष्ट किया कि भाषा का संरक्षण केवल पारंपरिक दृष्टि से नहीं, बल्कि राष्ट्रहित, प्रशासनिक सरलता और लोकतांत्रिक संवाद की दृष्टि से भी आवश्यक है। उन्होंने मीडिया को सुझाव दिया कि भाषा को सरल, स्पष्ट और सहज बनाए रखा जाए, ताकि जनता तक संदेश का संपूर्ण और सही रूप में संप्रेषण हो सके।

सूचना मंत्रालय ने यह संकेत भी दिया कि मीडिया संस्थानों को अपनी संपादकीय नीति और भाषा शैली की समीक्षा करनी होगी। इसके माध्यम से यह सुनिश्चित किया जाएगा कि हिंदी का मूल स्वर और सहजता बनी रहे। यदि हिंदी वास्तव में विश्वभाषा बनने का सपना देखती है, तो उसे अपने स्वरूप में सरलता, स्पष्टता और जनसुलभता बनाए रखना होगा।

अखिल भारतीय राजभाषा सम्मेलन ने यह भी स्पष्ट किया कि हिंदी का प्रसार केवल भाषाई और सांस्कृतिक पहल नहीं है, बल्कि यह प्रशासनिक कार्यकुशलता और लोकतांत्रिक संवाद का आधार भी है। अमित शाह की ठोस पहल ने यह संदेश दिया कि राष्ट्रभाषा की मजबूती और प्रचार-प्रसार के लिए केंद्र सरकार गंभीर रूप से प्रतिबद्ध है। उनके दृष्टिकोण में मीडिया संस्थानों की जिम्मेदारी बढ़ जाती है, और उन्हें अपने माध्यमों में हिंदी की स्पष्टता और शुद्धता सुनिश्चित करनी होगी।

इस बहस से यह भी स्पष्ट होता है कि भाषा केवल शब्दों का समूह नहीं है, बल्कि यह राष्ट्र की आत्मा, संस्कृति और पहचान है। सूचना एवं प्रसारण मंत्री अश्विनी वैष्णव ने स्पष्ट किया कि भाषा लोकतांत्रिक संवाद का अहम साधन है, और यही दृष्टिकोण राष्ट्र की विभिन्न योजनाओं और संदेशों के जनसंचार में लागू किया जा रहा है। उन्होंने मीडिया और जनता को यह भी संदेश दिया कि हिंदी को जनसुलभ और स्पष्ट बनाए रखना न केवल साहित्यिक दायित्व है, बल्कि यह राष्ट्रीय दायित्व भी है।

अंततः यह स्पष्ट है कि हिंदी केवल संवाद का माध्यम नहीं है, बल्कि यह भारतीय संस्कृति, परंपरा और राष्ट्रीय पहचान का प्रतीक है। सूचना मंत्रालय की पहल, अश्विनी वैष्णव की रणनीति, गृह मंत्री अमित शाह की प्रशासनिक दृष्टि सभी मिलकर यह सुनिश्चित कर रहे हैं कि हिंदी का स्वरूप सरल, स्पष्ट और जनसुलभ बना रहे। यदि यह दृष्टिकोण साकार होता है, तो हिंदी न केवल देश में बल्कि विश्व स्तर पर भी अपने स्थान को सशक्त कर पाएगी।

हिंदी की यह बहस केवल भाषाई शुद्धता की नहीं, बल्कि राष्ट्रभाषा के भविष्य, जनसंचार और लोकतांत्रिक संवाद के व्यापक आयामों की है। आने वाले समय में मीडिया संस्थानों को यह समझना होगा कि हिंदी केवल भाषा नहीं, बल्कि राष्ट्रीय अस्मिता और जनसंपर्क का महत्वपूर्ण माध्यम है। यही कारण है कि गृह मंत्री अमित शाह और सूचना मंत्री अश्विनी वैष्णव की पहल अत्यंत प्रासंगिक और भविष्यनिर्माणकारी है।